Poem of the week: Week Thirty Eight.

Time for the second poem from Amrita Pritam’s poetry collection प्रतिनिधि कविताएँ. 

कुफ्र
– अमृता प्रीतम 

आज हमने एक दुनिया बेची
और एक दीन ख़रीद लिया
हमने कुफ्र की बात की 

सपनों का एक थान बुना था
एक गज़ कपड़ा फाड़ लिया 
और उम्र की चोली सी ली 

आज हमने आसमान के घड़े से
बादल का ढकना उतारा
और एक घूँट चाँदनी पी ली

यह जो एक घड़ी हमने 
मौत से उधार ली है
गीतों से इसका दाम चुका देंगे 

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