Poem of the week: Week Forty.

The last post of the month of October is a slightly longish poem from Amrita Pritam’s poetry collection प्रतिनिधि कविताएँ.  
And as promised, the theme is Cities.

एक शहर
– अमृता प्रीतम


वह फ़सल जो सितारो ने बोयी थी
किसने इसे चोर गोदाम में डाल लिया
बादल की बोरी को झाड़कर देखा,
रात की मण्डी में गर्द उड़ रही है

चाँद एक भूखे बछड़े की तरह
सूखे थनों को चिचोड़ रहा है
धरती-मा अपने थान पर बँधी
आकाश की चिरनी को चाट रही है…


अस्पताल के दरवाज़े पर
हक़, सच, ईमान और क़द्र
जाने कितने ही लफ्ज़ बीमार पड़े हैं,
एक भीड़-सी इकटठी हो गयी है

जाने कोई नुस्ख़ा लिखेगा
जाने वह नुस्ख़ा लग जायेगा
लेकिन अभी तो ऐसा लगता है
इनके दिन पूरे हो गये हैं…


इस शहर में एक घर है
घर की जहाँ बेघर रेहते हैं
जिस दिन कोई मज़दूरी नहीं मिलती
उस दिन वे पशेमान होते हैं

बुढ़ापे की पहली रात
उनके कानों में धीरे से कह गयी
कि इस शहर में उनकी
भरी जवानी चोरी हो गयी…


कल रात बला कि सर्दी थी,
आज सुबह सेवा-समिति को
एक लाश सड़क पर पड़ी मिली है,
नाम व पता कुछ भी मालूम नहीं

शमशान में आग जल रही ह
इस लाश पर रोने वाला कोई नहीं
या तो कोई भिखारी मरा होगा
या शायद कोई फ़लसफ़ा मर गया है…


किसी मर्द के आग़ोश में –
कोई लड़की चीख़ उठी
जैसे उसके बदन से कुछ टूट गिरा हो

थाने में एक क़हकहा बुलन्द हुआ
कहवाघर में एक हॅसी बिखर गयी

सड़कों पर कुछ हॉकर फिर रहे हैं
एक-एक पैसे में ख़बर बेच रहे हैं,
बचा-खुचा जिस्म फिर से नोच रहे हैं


गुलमोहर के पेड़ो तले,
लोग एक-दूसरे से मिलते हैं
ज़ोर से हॅसते हैं, गाते हैं,
एक-दूसरे से अपनी-अपनी –
मौत कि ख़बर छुपाना चाहते हैं,
संगमरमर क़ब्र का तावीज़ है,
हाथों पर उठाये-उठाये फिरते हैं,
और अपनी लाश कि हिफ़ाज़त कर रहे हैं…


मशीनें खड़-खड़ कर रही हैं,
शहर जैसे एक छापाखाना है
इस शहर में एक-एक इन्सान
एक-एक अक्षर कि तरह अकेला है

हर पैग़म्बर एक कॉमपॉज़िटर
अक्षर जोड़-जोड़कर देखता है
अक्षरों में अक्षर बुनता है,
कभी कोई फ़िक़रा नहीं बन पाता…


दिल्ली इस शहर का नाम है
कोई भी नाम हो सकता है
(नाम मे क्या रखा है)
भविष्य का सपना रोज रात को
वर्तमान कि मैली चादर
आधी उपर ओढ़ता है,
आधी नीचे बिछाता है,
कितनी देर कुछ सोचता है, जागता है,
फिर नींद की गोली खा लेता है

***

Poem of the week: Week Thirty Nine.

It is very difficult to choose just four poems from Amrita Pritam’s प्रतिनिधि कविताएँ. The lines, the images are so many and so removed from clichés that one can’t help but feel amazed at Amrita’s immense talent and hard work.
The last two poems of October are about a theme that fascinates me no end: cities.

शहर
– अमृता प्रीतम 

मेरा शहर –
एक लम्बी बहस की तरह है…
सड़कें – बेतुकी दलीलों-सी
और गलियां इस तरह –
जैसे एक बात को
कोई इधर घसीटे कोई उधर

एक मकान
एक मुट्ठी-सा भिंचा हुआदीवरें –
किचकिचाती-सी
और नालियाँ
ज्यों मुंह से झाग बहती है…

यह बहस जाने
सूरज से शुरू हुई थी
जो उसे देखकर
यह और गरमाती
और हर द्वार के मुंह से
फिर साइकिलों
और स्कूटेरों के पहिये
गालियों की तरह निकलते
और घण्टिया हॉर्न
एक-दूसरे पर झपटते…

जो भी बच्चा
इस शहर में जनमता
पूछता कि किस बात पर
यह बहस हो राही है
फिर उसका प्रश्न भी
एक बहस बनता
बहस में निकलता
बहस में मिलता…

शंख घण्टो के श्वास सुखे
रात आती, सिर पटकती
और चली जाती
पर नींद में भी
बहस खत्म न होती
मेरा शहर
एक लम्बी बहस की तरह है…

***

Poem of the week: Week Thirty One.

The third poem from Mustansir Dalvi’s poetry collection Brouhahas of Cocks. Also, the second last poem for this month.

choosing trains
 Mustansir Dalvi

It’s those bloody slumwallahs again
my father curses, wet from the rain;
they’re back, throwing rocks at trains
so,so heartless, so totally insane.

I peek out from behind exhaust shaft
at the mob that destroys, burns and laughs;
duck just in time as a spinning half-
bat crashes through our grimy pane. 

The old man rushes to take us in
two sons, one wife, no next of kin
into the backroom store, on its roof of tin
skeletons dance to staccato strains.

I turn the back handle, quick, scurry out
onto rain swept rails, heart thudding, father shouts.
I turn left, then right, and finally, head south
to pick my rocks, to choose my trains.

***

The Sixteenth Rule of Love

The whole city was a Tower of Babel. Everything was constantly shifting, splitting, coming to light, transpiring, thriving, dissolving, decomposing, and dying. Amid this chaos Shams of Tabriz stood in a place of unperturbed silence and serenity, utterly indifferent to the world and yet at the same time, feeling a burning love for all the people struggling and suffering in it:

“It’s easy to love a perfect God, unblemished and infallible that He is. What is far more difficult is to love fellow human beings with all their imperfections and defects. Remember, one can only know what one is capable of loving. There is no wisdom without love. Unless we learn to love God’s creation, we can neither truly love nor truly know God. ”