Poem of the week: Week Forty Two.

Here’s the second poem from Hoshang Merchant’s poetry collection Love’s Permission.

Evening Song: 17 October 1995.
– Hoshang Merchant

This long evening
When old monuments hide in mist
belongs to me

It longs for all its history
The history of other long evenings
It longs for me

It tells me I’m nothing
That men will come and go
There will always be evenings

Then out steps a shade from the mist
It is not rain; it is memory
Calling to me

It says come back to your history
You were not nothing
You were sent to sing the night

And all the rain of Nohant
Descends on my heard with Chopin
What could he do but sing?

We sing always to shades
To mists and memory and evenings
There are no men everlasting

Only Love, evanescent
That passes hurting us into heart
Making everlasting nights of evenings.

***

 

Poem of the week: Week Forty One.

The poet for the month of November is Hoshang Merchant.
And poems  are from his fifth poetry collection Love’s Permission.

Song of the Courtesan
– Hoshang Merchant

I keep house
like a courtesan

I sit writing poems
in bed

I listen to old songs
of the courtesans

Boys who visit
Find here a strange peace

Even if my mood be
bad or sad

Life would go on
without us

But there would be no pleasure
we live as if there was no death

Though daily we die
in bed

Teaching the boys this
I cease to being the old courtesan that
I long to be
and become purely her song.

***

Poem of the week: Week Forty.

The last post of the month of October is a slightly longish poem from Amrita Pritam’s poetry collection प्रतिनिधि कविताएँ.  
And as promised, the theme is Cities.

एक शहर
– अमृता प्रीतम


वह फ़सल जो सितारो ने बोयी थी
किसने इसे चोर गोदाम में डाल लिया
बादल की बोरी को झाड़कर देखा,
रात की मण्डी में गर्द उड़ रही है

चाँद एक भूखे बछड़े की तरह
सूखे थनों को चिचोड़ रहा है
धरती-मा अपने थान पर बँधी
आकाश की चिरनी को चाट रही है…


अस्पताल के दरवाज़े पर
हक़, सच, ईमान और क़द्र
जाने कितने ही लफ्ज़ बीमार पड़े हैं,
एक भीड़-सी इकटठी हो गयी है

जाने कोई नुस्ख़ा लिखेगा
जाने वह नुस्ख़ा लग जायेगा
लेकिन अभी तो ऐसा लगता है
इनके दिन पूरे हो गये हैं…


इस शहर में एक घर है
घर की जहाँ बेघर रेहते हैं
जिस दिन कोई मज़दूरी नहीं मिलती
उस दिन वे पशेमान होते हैं

बुढ़ापे की पहली रात
उनके कानों में धीरे से कह गयी
कि इस शहर में उनकी
भरी जवानी चोरी हो गयी…


कल रात बला कि सर्दी थी,
आज सुबह सेवा-समिति को
एक लाश सड़क पर पड़ी मिली है,
नाम व पता कुछ भी मालूम नहीं

शमशान में आग जल रही ह
इस लाश पर रोने वाला कोई नहीं
या तो कोई भिखारी मरा होगा
या शायद कोई फ़लसफ़ा मर गया है…


किसी मर्द के आग़ोश में –
कोई लड़की चीख़ उठी
जैसे उसके बदन से कुछ टूट गिरा हो

थाने में एक क़हकहा बुलन्द हुआ
कहवाघर में एक हॅसी बिखर गयी

सड़कों पर कुछ हॉकर फिर रहे हैं
एक-एक पैसे में ख़बर बेच रहे हैं,
बचा-खुचा जिस्म फिर से नोच रहे हैं


गुलमोहर के पेड़ो तले,
लोग एक-दूसरे से मिलते हैं
ज़ोर से हॅसते हैं, गाते हैं,
एक-दूसरे से अपनी-अपनी –
मौत कि ख़बर छुपाना चाहते हैं,
संगमरमर क़ब्र का तावीज़ है,
हाथों पर उठाये-उठाये फिरते हैं,
और अपनी लाश कि हिफ़ाज़त कर रहे हैं…


मशीनें खड़-खड़ कर रही हैं,
शहर जैसे एक छापाखाना है
इस शहर में एक-एक इन्सान
एक-एक अक्षर कि तरह अकेला है

हर पैग़म्बर एक कॉमपॉज़िटर
अक्षर जोड़-जोड़कर देखता है
अक्षरों में अक्षर बुनता है,
कभी कोई फ़िक़रा नहीं बन पाता…


दिल्ली इस शहर का नाम है
कोई भी नाम हो सकता है
(नाम मे क्या रखा है)
भविष्य का सपना रोज रात को
वर्तमान कि मैली चादर
आधी उपर ओढ़ता है,
आधी नीचे बिछाता है,
कितनी देर कुछ सोचता है, जागता है,
फिर नींद की गोली खा लेता है

***